Monday, April 15, 2024
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असहाय – श्रम

ढूढ़ रहा है श्रेष्ठ श्रमिक
श्रम के बदले फल।
उसे सदा उत्तर मिलता है
आज नहीं कल।।

बीमार शिशु से कभी
कभी सूखी रोटी से।
कभी पूछता मजबूरी से
होकर विह्वल।।

हस रहे है शोषक वर्ग
देख उसकी मजबूरी।
उसे गिराकर फिर कहते हैं
सम्हल-सम्हल।।

दर उनके शोषित सदियों से
दे रहा है दस्तक।
वे उसको संगीत समझ
करते हैं निष्फल।।

गांधी के तीनों बंदर ही
है संरक्षक शोषक के।
काम है उनका चिर लेकिन
परिभषाएं गई बदल।।

है डॉट रहा चेतन को जड़
बेईमानी का लेकर हंटर।
चेतना शून्य “डेमोस” देख
जग का बेकल।।

-यल जे “डेमोस”

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